:::  दीपक का जीवन  :::

मथी जाती है माटीचकले पर चढ करनाजुक स्पर्श से गढ करआग के कुँए से गुजर करवजूद बनता है दिए कामुँह में बाती को सम्भालेसंजो कर वो गर्म तेलरात भर देखता रहता हैउस नाचती लौ कोजिसकी रोशनी में नहा करदुनिया दिवानी हो जाती हैसूरज का बेटा आया हो जैसेघर चमक सा जाता हैआशा से भर जाते हैं जीवनप्रकाश की परियाँ हँस रही हैंडूबो कर अंधेरों की मटकीजो हवा के घोड़ों पर सवारधावा कर रहे हैं उस लौ परदिया लड़ता रहा सारी रातमुन्डेर बनी किले की दीवारसुबह तक कालिख में लतपतसारी उर्जा जा चुकी थीबाती में लौ भी समा चुकी थीरह गया सिर्फ अकेला दीपकएक औऱ रात जीने के लिए।

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11 Comments

    • Uttam 03/11/2016
  1. mani 31/10/2016
    • Uttam 03/11/2016
  2. Shishir "Madhukar" 31/10/2016
    • Uttam 03/11/2016
  3. डॉ. विवेक 31/10/2016
  4. babucm 01/11/2016
    • Uttam 03/11/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 02/11/2016
    • Uttam 03/11/2016

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