सँभल रहा हूँ – शिशिर मधुकर

पैरों में जंजीर भारी फ़िर भी जतन से चल रहा हूँ ना सुनी अपनों की बातें अब बैठ हाथ मल रहा हूँटूटे मेरे सपने तो गहरी खाइयों में मैं भी गिर गया खुद को बचा धीरे धीरे देखो फ़िर से सँभल रहा हूँ                                    दे कर मुझे भौंरे सा मन कोई भी गुलशन ना दिया पुष्प रस की प्यास में मैं तो अब भी मचल रहा हूँउसे रोशनी देने की खातिर मैं तो सदा जलता रहाइस जतन में मैं मगर कतरा कतरा पिघल रहा हूँ                               शिव तो नहीँ विष को जो मधुकर कंठ में ही रोक ले चाहा नहीँ पर सारा गरल मैं मुद्दतों से निगल रहा हूँ.शिशिर मधुकर

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14 Comments

  1. mani 29/10/2016
    • Shishir "Madhukar" 30/10/2016
    • Shishir "Madhukar" 30/10/2016
  2. Meena Bhardwaj 29/10/2016
    • Shishir "Madhukar" 30/10/2016
  3. sarvajit singh 29/10/2016
    • Shishir "Madhukar" 30/10/2016
  4. babucm 29/10/2016
    • Shishir "Madhukar" 30/10/2016
  5. Kajalsoni 29/10/2016
    • Shishir "Madhukar" 30/10/2016
  6. Dr Swati Gupta 29/10/2016
    • Shishir "Madhukar" 30/10/2016

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