शांत रहिये पार्ट – 4

शांत रहिये, शांत रहियेयह शब्द क्यों चुभने लगे है आज कल ,क्या शांत रहने के लिए ही ,ईश्वर ने दी थी जुबान।गिला नहीं है कुछ भी तुमसे ,गिला है तो उपरवाले से ,क्योकि ,समझता है हर कोई मुझ को ,मगर जो सुन भी सके ,ऐसे लोग ,इस धरती पर गिनती के हैं छोड़े।औरों की तो बहुत सुन चुकी ,अब अपनी कहना चाहतीं हूँ ,पंछी बन कर उड़ना और ,हवा संग फिर बहना चाहती ,अब अपनी कहना चाहती हूँ।सुख तो सारे दे डाले तुमने और ,सुविधाएँ भी एक ना छोड़ी ,मगरअपने मन की ख़ुशी के लिए ,थोड़ा तो जी लेने दो ,कहना हैजो सबसे अब तो कह लेने दो।सूख गए आँसुओं को थोड़ा तो ,थोड़ा बह लेने दो ,मन मे है ,जो है सब अब तो कह लेने दो ,चाहे बन कर कविता या ,बन जाए मेरी बक बक।करो मत शांत मुझ को ,कहना है जो सब मुझ को ,रोको मत आज मुझे ,अब तो कह लेने दो ,समय केसाथ मुझे थोड़ा बह लेने दो ।

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10 Comments

    • Manjusha 29/10/2016
  1. Shishir "Madhukar" 29/10/2016
    • Manjusha 29/10/2016
  2. Meena Bhardwaj 29/10/2016
    • Manjusha 16/11/2016
  3. Dr Swati Gupta 29/10/2016
    • Manjusha 16/11/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 29/10/2016
    • Manjusha 16/11/2016

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