एक दिवाली ऐसी भी हो

एक दिवाली ऐसी भी हो, दीप जले अंतर्मन में।अंधकार सब मिट जाए, हो प्रकाश मनुज-मन में ।अहंकार सब धुल जाये, निर्मल-नीर बहे जन में।एक दिवाली ऐसी भी हो, दीप जले अंतर्मन में ॥बरस जाये संतोष धन, दीप जले मन-आंगन में।पुजा हो जग में सृजन का, कमल चढे समर्पण में ।समदृष्टि हो मानवता का, हो अभेद धन-निर्धन में।एक दिवाली ऐसी भी हो, दीप जले अंतर्मन में ॥आग लगायें मन के भीतर, छुपे हुए दुःशासन में।गायें सब विश्वास आरती, डीगे ना लोभ-लुभावन में॥महालक्ष्मी का दर्शन पायें, सदा हृदय के दर्पण में।एक दिवाली ऐसी भी हो दीप जले अंतर्मन में ॥रंगोली मुस्कान सत्य का, तीलक मिटे ना उलझन में।फुलझड़ियों सी रंग-बीरंगी, सजा रहे जीवन हर क्षण में ॥नव-नुतन हो वस्त्र धॅर्य का, “रंजीत” जीते हर रण में।एक दिवाली ऐसी भी हो, दीप जले अंतर्मन में ॥एक दिवाली ऐसी भी हो, दीप जले अंतर्मन में ॥रंजीत कुमार झा

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6 Comments

  1. babucm 28/10/2016
    • rajdipindia1982 28/10/2016
  2. mani 28/10/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 28/10/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 28/10/2016

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