गजल जैसा

हो गये समझदार, हम भी दाँव आजमाने में लगे हैं।समझता कौन है यहाँ, हम भी समझाने में लगे हैं॥दिल से नहीं दिमाग से, अब तो बनते रिस्ते नाते हैंस्वार्थ से सम्मान और, मतलब से मनाने में लगे हैं॥हमने देखा है छवि, कई कार्यालयों का इस कदर।जहाँ काम होता नहीं, बस सभी कमाने में लगे हैं॥कौन जाता है अब अदालत मामला सुलझाने के लियेवकिल खुद अपने मुव्क्किल को उलझाने में लगे हैं॥रंजीत कुमार झा

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10 Comments

  1. mani 28/10/2016
    • rajdipindia1982 28/10/2016
    • rajdipindia1982 28/10/2016
    • rajdipindia1982 28/10/2016
  2. babucm 28/10/2016
    • rajdipindia1982 28/10/2016
  3. Kajalsoni 28/10/2016
    • rajdipindia1982 28/10/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 28/10/2016

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