प्रतीक्षा

कोई नही था उसका जिसे वह अपना कहतीसिवाय तुम्हारेशायद तुम नही जानतेप्रभा की पहली किरन सेस्वप्नों की अंतिम उड़ानों तकप्रतिदिन प्रतिक्षणसिर्फ तुम थे शायद तुम नही जानतेसर्दी की धूप में स्वेटर के धागों में उलझतेसंवेदनाओं में आकार लेतेकभी सरसों के खेत की पगडण्डी पर उसकी गोद मेंसिर टिकाये उसे निहारतेउसकी अंतरंग सी बातों में हँसते खिलखिलाते उसकी बाँहों में लिपटे दुःख की परछाइयों पर रौब गांठते कभी सिरहाने तकिये के नीचे से निकल मधुर मिलन की आस में लरज़ते अधरों के नाजुक स्पर्श तक सिर्फ तुम थेशायद तुम नही जानतेउसने कहा नही कभी किसी सेसिवाय तुमसेकि सिर्फ तुम थेतुम जानते होसिर्फ तुमने महसूस कियाउस पवित्र प्रेम की गहराई कोऔर उड़ चले उसके संगप्रेम के असीम अनंत आकाश में जहां मिट जाता है दो होने का भावशायदतुम जानते होफिर भी तुम खामोश रहेऔर उसने भी कुछ नही कहा कभी किसी सेऔर चुपचापनिभाईतालीम और संस्कार कीवह परंपराजिसके परिणीत मै आयातुम जानते होअब मै हूँजिसे वह अपना कहती हैतुम जानते होपर मै नही जान पायाक्यों हूँजबकि तुम होशायद तुम नही जानतेनही ले सकता मै तुम्हारी जगहऔर न भर सकताहूँ उस खालीपन कोजो उत्पन्न हुआ हैमेरे होने सेबस मुझे “प्रतीक्षा”है प्रेम के उसी असीम अनंतआकाश में उतर “तुम” होने कीशायद तुम नही जानते यही मेरी नियति हैशायद तुम नही जानते।……देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत’

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4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/10/2016
  2. C.M. Sharma babucm 24/10/2016
  3. Kajalsoni 24/10/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/10/2016

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