रोमाँच

हरेक की अपनी सीमाएँ है,मर्यादा की डोर से लिपटे,कुछ अपनी भावनाए दबाये रखते है,कुछ मर्यादा की सीमओं में भी,बेख़ौफ़ गाते है,कुछ इससे आगे बढ़कर,मर्यादा लाँघ जाते है,कुछ भी हो,भावनाओं की उहापोह का संतुलन,एक रोमाँच से कम नहीं,“मर्यादा” से दो दिशाएँ,एक डर की ओर,दूसरी आस्था की ओर,जब अंधी हो कर निकलती है,दोनो ही स्थितियां,दुखों के गर्त में लुढ़का देती है,जहाँ से बाहर निकलना,बरा ही कठिन होता है,इसके विपरीत,जब द्रष्टा हो,डर और आस्था को विश्लेषित कर,खुली आँखों से,तटस्त रहने की कोसिस की जाये,बेख़ौफ़ गीत गायी जाए,तो बस अनोखा ही अनोखा होता है,सीमाओं से पार अनंत,अद्भुत आनंद होता है

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