मन का अन्तर्द्वन्द

दिल में चल रहा एक अन्तर्द्वन्द है,पूँछ रहा बार बार ये मन है,बाहर से खिलता कमल हूँ ,मन में क्यूँ दुःख का चमन है,कलियों सी मुस्कान है ये,फिर दिल में क्यूँ काँटो की चुभन है,औरों के दर्द की दवा हूँ,खुद के जख्म क्यूँ नासूर बने हैं,दूसरों के आंसुओं को पोछती हूँ,फिर मन में क्यूँ आंसुओं के सैलाब बने हैं,हर पल हँसने और हँसाने वाली,अन्दर ही अंदर क्यूँ बेजान बनी है,मजबूत है ये शख्सियत इतनी,फिर दिल की इतनी नाजुक क्यूँ है,दिल में चल रहा एक अन्तर्द्वन्द है,पूँछ रहा बार बार ये मन है।।By:Dr Swati Gupta

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13 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 22/10/2016
    • Dr Swati Gupta 23/10/2016
  2. Rajeev Gupta 22/10/2016
    • Dr Swati Gupta 23/10/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 22/10/2016
    • Dr Swati Gupta 23/10/2016
  4. mani 22/10/2016
    • Dr Swati Gupta 23/10/2016
    • Dr Swati Gupta 23/10/2016
  5. babucm 22/10/2016
    • Dr Swati Gupta 23/10/2016
  6. Kajalsoni 24/10/2016

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