उम्मीद

उम्मीद पुष्प शाख से नीचे आकर जमीं से मिलता रहता है ,फिर भी जीवन इस त्रिभुवन में निशिदिन चलता रहता है ।सावन सदा लौटकर आता है जीवन के उपवन में ,खुशियों का सैलाब उमड़ता है हर सूने आँगन में ।जिन कदमों ने पथरीलों राहों पर चलना सीख लिया ,जिन शोलों ने तूफा के आँगन में जलना सीख लिया ।आशाओं का फूल पहाड़ों पर भी उगता रहता है ————फिर भी जीवन ——-जीवन के पन्नों को आकार वक़्त पलटता रहता है ,गम को भुलाकर देखो ए गुलशन भी सँवरता रहता है ।मेंहदी बनकर आज खुदा मैं दुनियाँ का शृंगार करूँ ,धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की खातिर नई पौध तैयार करूँ ।जीवन के इस चौराहे पर मिलते और बिछड्ते हैं,सजती दुल्हन कहीं कहीं पर अपने के शव जलते हैं ।रोज सुबह मेरी छत आकर शाम से मिलता रहता है । —— फिर भी जीवन——-

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