भ्रम

भ्रमजी रहा था अब तकजाने कैसी भ्रम मेपरछाईयो को समझ अपनामे तो बस चलता रहासाथ छूटा जब अंधेरों मेतब मुझको ये एहसास हुआवो भ्रम था उजालों कावो बाजीगरी थी रोशनी कीजिन्हे समझ बैठा था अपनाहक़ीक़त मे वो न तब थी न अबमै तो तब भी तनहा था आज भीपास तो तब भी सभी थे आज भीफिर भी क्यो मुझे ऐसा लगता है पास हर कोई है मेरेपर साथ कोई भी नहींअब तो वो भ्रम भी नहींजिसे साथ समझ हमचले जा रहे थे अपनी धुन मेपागलों सा परछाईयो के पीछेअपनी एहसासों को उनसे बाटते हुएआज जब टूटा वो सपनो का सफ़रतब जाने दिल से ये क्यों आवाज़ आईक्या ये भ्रम ज़रूरी है जीने के लिए?

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3 Comments

  1. Tushar Gautam 16/10/2016
  2. babucm 17/10/2016
  3. Shishir "Madhukar" 18/10/2016

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