मुहब्बत की शमा…………मनिंदर सिंह “मनी”

यह ग़ज़ल १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ बह्र में लिखी है…..आप सभी विद्वान जानो से निवेदन है की आप मुझे बताये कहाँ कमी है……….आपके सुझावो की प्रतीक्षा में……………. न होगा अब भरोसा हर किसी के हाथ भाले है,मुहब्बत की शमा दिखती नहीं हर घर में ताले है,ख़ुशी होती नहीं कोई अगर आगे निकल जाए,नफे की सोच रख रिश्ते सभी अब जीने वाले है,इरादे नेक रख कर चल कभी मंजिल मिलेगी मित्र,खिलाये खेल ऊपर से ठट्ठे उसके निराले है,पिता माता से बढ़ कर कुछ नहीं इस संसार में सबसे,भुला संस्कार हम अपने बड़ों के आगे बोले है पिलाया दूध हर माँ ने बिना कुछ सोच कर अपना,”मनी” उसके न जाने क्यों छिने हम ने निवाले है,

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6 Comments

  1. Dr Swati Gupta 15/10/2016
    • mani 15/10/2016
  2. babucm 15/10/2016
    • mani 15/10/2016
  3. ALKA 16/10/2016
    • mani 18/10/2016

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