मेरा ठिकाना-७—मुक्तक—डी के निवातियाँ

तेरे दिल के खंडहर में पड़ा है फटा-टुटा बिछाना कल होते थे जहाँ पल गुलजार, आज है वीराना अल्फाज लंगड़े हो गये, जज्बातो की ज़ुबाँ गयी देह तो बेजान है रूह तलाश रही है मेरा ठिकाना !!!!!______डी के निवातियाँ ____!

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 20/10/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/10/2016
  2. Dr Swati Gupta 20/10/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/10/2016
  3. babucm 20/10/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/10/2016
  4. mani 21/10/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/10/2016

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