“साया”

“साया”१.आज पूरा मानव-जिन्दगी पर है, आतंक का साया कभी सोंचा हमसब ने, ऐसा हाल किसने बनाया ये है सलीका ? मानव तंत्र को जगाने का गुप्त प्रकृति से एक अच्छे समाज बनाने का क्या करें ? कानून, संबिधान है बना पर, भ्रष्ट सोंच व् कुंठित भावना से समाज़-देश का नाम ऊँचे तख्तों पर लटकायाजो स्पस्ट है कहता, ऐसा हाल किसने बनाया आज पूरा मानव-जिन्दगी पर है, आतंक का साया कभी सोंचा हमसब ने, ऐसा हाल किसने बनाया २.हम सब के बगल में, कुछ न कुछ होता है पर मतलब, अपने और अपनों से रखते है कोई कुछ करे, हमें क्या लेना-देनापर जब, अपने को खोता है तो कर्मो को छोड़, भाग्य को कोसता है फिर छाती पीट, खूब रोता है यही सोंच से सबने अपनी,जिन्दगी का अनमोल घड़ी है खोया आज पूरा मानव-जिन्दगी पर है, आतंक का साया कभी सोंचा हमसब ने, ऐसा हाल किसने बनाया ३.कहाँ रहते हो ? क्या करतें हो ?मान-सम्मान खो कर, फिर, किसके उपर, दम भरते हो जिम्मेवारी से भाग, स्विस बैंक भरते हो कभी सोंचा, अपने हीं बनाये कानून कोसही से, अमल में नहीं लाया आज पूरा मानव-जिन्दगी पर है, आतंक का साया कभी सोंचा हमसब ने, ऐसा हाल किसने बनाया *** ***

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 27/09/2016

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