“दिल-ए-नादां”

इश्क का दीदार हर किसी को नसीब होता क्यों नहीं
शबाब-ए-हुस्न का ख्वाब हर किसी का पूरा होता क्यों नहीं ।

दिल-ए-नादां तू नासमझ है
बिखर चुकी है मिरी हयात तू टूटकर बिखरता क्यों नहीं ।

महफूज़ जिसे तूने रखा है अपने भीतर
जसारत से बाहर निकालता क्यों नहीं ।

न मिले वो तुझे तू ग़म न कर
तू उन्हें दिल-ए-पत्थर समझता क्यों नहीं ।।

*मिरी हयात – मेरी जिंदगी
*जसारत- दिलेरी

– आनन्द कुमार
हरदोई (उत्तर प्रदेश)

8 Comments

  1. Shishir Madhukar 25/09/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 26/09/2016
  2. C.M. Sharma babucm 25/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/09/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 26/09/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/09/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 26/09/2016

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