माँ तूझे भूला ना पाया – आलोक पान्डेय

माँ!एक दिवस मैं रूठा थाबडा ही स्वाभिमानी बन , उऋण हो जाने कोतुमसे भी विरक्त हो जाने को,त्यागी बन जाने को !घर त्याग चला कहीं दूर वन कोध्यानिष्ठ हुआ पर ध्यान नहीं, न शांति होती मन कोयह चक्र सतत् चलता रहापर जननी! तेरी याद कहाँ भूलता रहा !!पर नहीं , तप तो करना हैत्याग धर्म में मरना हैयह सोच अनवरत् उर्ध्व ध्यान मेंहो समाधिस्थ तपः क्षेत्र में,मन, तन से दृढ हो तप पूर्ण कियापर नहीं शांति थी ना सुस्थिरता, क्या एेसा अपूर्ण हुआ !!!बुझा हुआ अब अटूट उत्साह थानहीं कहीं पूर्ण प्रवाह थाअचानक क्षुधा की प्यास लगतीमाँ !!!तेरी कृपा की आस लगतीममतामय छाया ना भूलती दोपहरी तपी और पाँव जले पर कहाँ सघन छाया?माँ !!!तेरी आँचल ना भूला पाया हर ओर तुम्हारी थी छाया ! — आलोक पान्डेय ————–_–_——_=

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11 Comments

  1. babucm 25/09/2016
  2. भलमानुषभलमानुषद 26/09/2016
  3. टठडढण 26/09/2016
  4. आन्नग आनंद 26/09/2016
  5. बिजय बाबू 26/09/2016
  6. बलवान भैरव 26/09/2016
  7. वंदनाभारततीय 26/09/2016
  8. वंदन 26/09/2016
  9. वंदन 26/09/2016
  10. कवि मनोरथ लाल 26/09/2016

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