“नसीब 2 “……. काजल सोनी

नसीब मेरा था सबके नसीब से ऊंचा ,
लड़खड़ा कर जब गिरा,
तो टुकड़ों को भी न ढूंढ पाया ।

साथ नहीं था नसीब में जब उनका ,
तो करीब रह कर भी ,
जगह दिल में न बना पाया ।

हसरत भी नसीब से दिल में बसती हैं ,
जो करीब थे उनसे मोहब्बत नहीं ,
जिनसे मोहब्बत थी उनसे मै न मिल पाया ।

नसीब दर्द का भी अजीब था,
जब दर्द था तो सह न पाया ,
जब दर्द से दूर हुवा तो रह नहीं पाया ।

“काजल सोनी “

24 Comments

  1. babucm 25/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  2. ANAND KUMAR 25/09/2016
    • Kajalsoni 15/10/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 25/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 25/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  4. पवन कुमार सिंह 25/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  5. शीतलेश थुल 25/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  6. Shishir "Madhukar" 25/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  7. Meena Bhardwaj 25/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  8. Subhash 25/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  9. MANOJ KUMAR 26/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
    • Kajalsoni 26/09/2016
  10. Markand Dave 24/10/2016
    • Kajalsoni 24/10/2016

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