कभी-कभी (डॉ. विवेक कुमार)

कभी-कभी
कभी-कभी किसी के इकरार और इनकार में
टिकी होती है हमारे सपनों की गगनचुंबी इमारत.

टिकी होती है हमारे जीने की सारी उम्मीदें
और काफी हद तक प्रभावित होती है
हमारी कार्यक्षमता और कार्यकुशलता.

कभी-कभी छोटी-मोटी परेशानियों से
परेशान हो जाते हैं हम
आ जाती है उनकी सलामती की दुआएँ
हमारे होठों पर बरबस ही.

कभी-कभी आत्मिक सुकून मिलता है
सागर किनारे डूबते सूरज को देखकर
अच्छा लगता है किसी की यादों और विचारों में खोये हुए
खुद से बातें करते दूर बहुत दूर निकल जाना.

कभी-कभी उदासी और मायूसी के क्षणों में
अकसर ही मुझे होता है
तुम्हारे साथ होने का भ्रम.

कभी-कभी असमय आ जाता है वसंत
फूट पड़ते हैं स्वप्नों की नयी-नयी कोंपले
गुंजने लगती है कोयल की स्वर लहरी मन के उपवन में
किसी के स्मृतियों की दस्तक मात्र से.

कभी-कभी ही आना होता है तुम्हारा मेरे जीवन में
किंतु जब कभी-भी घिरा मैं समस्याओं और संकटों के बीच
सारी समस्याओं के समाधान की
तरह मिली मुझे तुम…

तेली पाड़ा मार्ग, दुमका-814 101
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित।

10 Comments

  1. शीतलेश थुल 22/09/2016
  2. Pallavi 22/09/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 22/09/2016
  4. Shishir "Madhukar" 22/09/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/09/2016
  6. babucm 22/09/2016
  7. Markand Dave 23/09/2016
  8. Meena Bhardwaj 23/09/2016

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