मजबूर

 

 

जो सर सरहद पर
न झुका
उस सर को
कुचल ते देखा….
जिन हाथों को
दुश्मन के गले दबाते
देखा
उन हाथों को मज़बूरी में
जुड़ते देखा …..
जो आँखे सरहद पर
अंगारे उगलती
उन्ही आँखों को मज़बूरी के
आंसुओं से भरा देखा……
क्योंकि ..
आज वो सरहद पर नहीं
अपनी सरकार
की देहरी पर खड़ा है…..
*होके मजबूर*

 

कपिल जैन

6 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/09/2016
  2. Shishir "Madhukar" 22/09/2016
  3. babucm 22/09/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 22/09/2016
  5. Markand Dave 23/09/2016

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