चट्टर बट्टर गल्ल

 

अब कहाँ से लाऊँ
हर रोज़ नये लफ़्ज़,
जो आपको,भायें
कवितायें,
आपको पसंद आयें
हैं कहाँ, लफ़्ज,
जो बयाँ कर पायें,
दास्ताँ हम सब,
और उन सबकी,
असल मे सारी कहानी,
घूमती है,
छोटे से दायरे के इर्द गिर्द,
चन्द लफ़्ज़ों और
जज़्बातों के चारों ओर,
गोल गोल बवंडर के माफ़िक,
लफ़्ज़ भी जाने पहचाने हैं,
और जज़्बात भी,
फ़िर भी इंसान है तलाश में,
कुछ नये की!
शब्द तो वो के वो ही पुराने हैं,
अपने ही मौहल्ले के बाशिन्दों के
चेहरों की माफ़िक,
यकीं नहीं है,
तो जरा इन लफ़्ज़ों से ,
नज़र बचा कर दिखाओ
मोहब्बत,
मज़बूरी,
हालात,
कमज़ोरी,
हिम्मत,
दौलत,
दस्तूर,
जज़्बात,
…..
……
…….
……..
जवानी,
अमीरी,
गरीबी,
इसकी,उसकी
भूख प्यास ,सुख ,दुख….
और तमाम दुनिया भर की,
चट्टर बट्टर गल्ल……………..!
कपिल जैन

4 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma 19/09/2016
  2. babucm 19/09/2016
  3. Kajalsoni 19/09/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 19/09/2016

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