हार-2….सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

हारना भी एक कला है…
हारना कोई नहीं चाहता आज कल…
सब अपनी जीत के लिए भाग रहे…
एक दूसरे से आगे होने को होड़….
ज़रा सा पीछे रहना भी नहीं मंज़ूर….
कितनी लालसा है जीत की….

जीतने की होड़ में कितने रिश्ते टूट के बिखरे…
नहीं परवाह…बस जीतना है….
बच्चे छोटे से बड़े ज्यों ज्यों होते गए….
फासले भी बड़े होते गए…..
घर में हर किसी के लिए नौकर चाकर…
और सब साज सामान रख लिया…
हर वो वस्तु जो ख़ुशी दे सकती है घर…
पर मन में…..

जीत की चाह में भागदौड़ से…
कभी थक के जब बैठता है मन…
तो डरता है अकेलेपन से….
सब रिश्ते तो हैं पर खो गए….
उस अकेलेपन से घबरा के…..
वो फिर भागने लगता है जीत के लिए…
इस लिए नहीं कि अब उसको जीतना है…
इस लिए की लोगों को दिखाना है कि….
वो ज़िन्दगी में हारा नहीं ना हारना चाहता….
भीतर कहीं जानता है कि वो…
रिश्तों की हार को छुप्पाना चाहता है….
इस लिए जीतने को भाग रहा…
कितनी अजीब सी यह जीत की हार है…
है ना….

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/सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

18 Comments

  1. mani 17/09/2016
    • babucm 17/09/2016
  2. Kajalsoni 17/09/2016
    • babucm 17/09/2016
    • babucm 17/09/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 17/09/2016
    • babucm 18/09/2016
  4. Meena bhardwaj 18/09/2016
    • babucm 18/09/2016
    • babucm 19/09/2016
  5. MANOJ KUMAR 19/09/2016
    • babucm 19/09/2016
  6. Shishir "Madhukar" 19/09/2016
    • babucm 19/09/2016
  7. ALKA 20/10/2016
    • babucm 20/10/2016

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