मेरा ठिकाना—मुक्तक —(डी के निवातियाँ)

अक्सर लोग पूछते है मुझसे मेरा ठिकाना
मै ठहरा बेघर परिंदा नही कोई आशियाना
ठोकरे खाता फिरता हूँ सफर ऐ जिन्दगी में
पा जाऊं मंजिल जिस रोज़, वही चले आना ।।



डी के निवातियाँ[email protected]@@

16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 21/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016
  2. babucm 21/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 22/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016
  4. Dr Swati Gupta 22/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016
  5. Kajalsoni 22/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016
  6. Meena bhardwaj 22/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016
  7. शीतलेश थुल 22/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016
    • निवातियाँ डी. के. 23/09/2016

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