चाह नहीं तेरे गीतों में

चाह नहीं तेरे गीतों में

चाह नहीं तेरे गीतों में
एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ
चाह नहीं तेरी वीणा में
उलझ तार-सा बस बन जाऊँ

काव्य सुधारस पाऊँ तेरा
इन प्राणों की चाह नहीं है
तेरी प्रिय वाणी पर नाचूं
इन गीतों की चाह नहीं है

चाह नहीं तुझसे मिलने को
तन तजकर मैं बाहर आऊँ
चाह नहीं तेरे गीतों में
एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ

तू चाहे तो नवरस भर दे
खाली घट में लीला भर दे
चाहे तो बंशी की धुन से
प्राणों में अपना स्वर भर दे

चाह नहीं इन क्षणिक सुखों में
प्राणों का सर्वस्व लुटा दूं
चाह नहीं तेरे गीतों में
एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ

सुन मेरे गंभीर सुरों को
तू क्योंकर आँसू रचता है
बड़ी वेदना होती जब जब
तू मेरा आँसू बनता है

चाह नहीं तू शीश झुका दे
जब मैं माला तूझे चढ़ाऊँ
चाह नहीं तेरे गीतों में
एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ

तू दूर रहे तो दूर रहे
मैं क्यूं तेरे सम्मुख आऊँ
है तुझमें अभिमान बहुत तो
मैं क्यूं तेरा गर्व मिटाऊँ

चाह नहीं पर जब तू गावे
मैं अपने सब गीत बुझा दूं
चाह नहीं तेरे गीतों में
एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ।

जग के कण-कण में तू ही तो
अपने को बंदी रखता है
मुक्त वहीं मैं रहना चाहूं
कैद जहाँ तू खुद रहता है

चाह नहीं तेरी बेड़ी में
तुम संग मैं भी बँधता जाऊँ
चाह नहीं तेरे गीतों में
एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ।

… भूपेन्द्र कुमार दवे

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7 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 15/09/2016
  2. Dr. Vivek Kumar 15/09/2016
  3. Kajalsoni 15/09/2016
    • bhupendradave 16/09/2016
  4. babucm 15/09/2016
    • bhupendradave 16/09/2016

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