जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा

जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा
होगी कब इक मुलाकात मैं सोचता रहा।

सुना था तू मेरे दर आके लौट गया था
क्या थी कमी मुझमें मैं बस यही सोचता रहा।

तुम इक आवाज बन फलक में गूँजते रहे
मैं बहरों की भीड़ में बहरा बन छिपता रहा।

तू मिला भी तो इक गरीब अजनबी की तरह
मैं अमीरों की तरह तिजोरी खंगालता रहा।

रात इधर ढलती रही दिन उधर निकलता रहा
मैं कंपित लौ का दिया धुँआ धुँआ जलता रहा।

चिरागे-हयात तूने ही जलाके बुझा दिया
मैं नाहक ही अपनी साँसों को कोसता रहा।

मेरे गुनाहों का काफिला साथ चलता रहा
तेरे मेरे बीच का फासला भी बढ़ता रहा।

मैं अपने गुनाहों को छिपाता भी तो कैसे
तार तार कफन मुझे उरियाँ करता रहा।
—- भूपेंद्र कुमार दवे

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8 Comments

  1. babucm 13/09/2016
    • bhupendradave 14/09/2016
      • babucm 14/09/2016
  2. Kajalsoni 13/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 13/09/2016
  5. kiran kapur gulati 14/09/2016

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