मेरा गाँव (बाल कविता)

शिल्प: चौपई छंद 15-15 मात्राओ की 4 सम मात्रिक चरण
अंत में गुरु लघु।।।

नदी किनारे मेरा गाँव।
बरगद देता शीतल छाँव।
सुंदर मनमोहक ये ठाँव
देख पथिक के रुकते पाव

रोज़ शाम सजती चौपाल।
जुटते बड़े-बाल गोपाल।
ठुमरी दादर करें धमाल।
ढोल मजीरा छेड़ें ताल।।

गेहूँ सरसों मक्का धान।
आम पपीता झूमे पान
खेतों में मगन किसान
सर की पगड़ी उसकी शान।

जंगल हरे खेत खलिहान।
बाग़ों में कोयल का गान।
धरती का धानी परिधान।
रखता गाँव यही पहचान।

सुबह सुनहरी मोहक शाम।
मिलजुल कर करते सब काम।
मन्दिर सा पावन यह धाम
संग खुदा के रहते राम।।
!!!!!
!!!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह ‘कुशक्षत्रप’

8 Comments

  1. babucm 13/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016
  2. Kajalsoni 13/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016
  3. शीतलेश थुल 13/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 13/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016

Leave a Reply