”मैं हिंदी हूँ स्वयं प्रमाणित”

नहीं चाहती अस्तित्व होने का
ना खोने की चिंता है
चाहते हैं जो लोग सहस्रों
वही गौरवी-चहेती जनता है.

आवेश ही क्या कोई मेरा
कभी बांध पाया है
मैं निरंतर धरा हूँ प्रवाहित
इस बाढ़ में हरेक समाया है.

विश्व में अस्तित्व का अपने
हाँ, लौहा मैनें मनवाया है
रूचि रूपी अलख जगा विद्वानों ने
आज हिंदी दिवस मनाया है.

हिन्द ने मुझे पाला-पोसा
इसलिए गौरव से हूँ अभिमानित
प्रमाण नहीं चाहती औरों से
मैं हिंदी हूँ स्वयं प्रमाणित
हाँ, ‘मैं हिंदी हूँ स्वयं प्रमाणित’.

कवि :- कमल वीर सिंह उर्फ़ कमल “बिजनौरी”

9 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 12/09/2016
    • कमल "बिजनौरी" 12/09/2016
      • कमल "बिजनौरी" 14/09/2016
  2. babucm 12/09/2016
    • कमल "बिजनौरी" 14/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/09/2016
    • कमल "बिजनौरी" 14/09/2016
    • कमल "बिजनौरी" 14/09/2016

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