मेरा विद्यालय (बाल कविता)

(लावणी कुकुभ ताटंक तीनो छन्दों में)

विद्यालय यह मेरा न्यारा,
विद्यार्चन करें पुजारी।
ज्ञान-सुमन से ही पुष्पित है,
अपनी यह सुंदर फुलवारी।।

शिक्षक हैं विद्वान गुणी सब,
हम बच्चों को भाते हैं।
जाति धर्म से ऊपर उठकर,
जीना हमे सिखाते हैं।१।

मिले सफलता कैसे हमको,
वो हर पल समझाते हैं।
कच्ची मिट्टी के ढेरों को,
सुंदर घड़े बनाते हैं।।

मैडम लगती सबसे प्यारी,
अच्छी बात बताती हैं।।
खेल खेल में सहज भाव से,
हमको विषय सिखाती है।२।

यह भी सच है हम बच्चों को,
स्कूल लगे है पिंजर सी।
पर ना जाएँ यदि पढ़ने तो,
भूमि बने यह बंजर सी।।

विद्यालय में निस दिन अपने,
ज्ञान की ज्योति जलती है।
पढ़ लिख कर उत्कृष्ट बनें हम,
सबकी कोशिश रहती है।३।
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सुरेन्द्र नाथ सिंह ‘कुशक्षत्रप’

शिल्प विधान:
ताटंक छंद : 16 -14 मात्रा के साथ अंत में तीन गुरु
कुकुभ छंद: 16-14 मात्रा के साथ अंत में दो गुरु
लावणी छंद: 16-14 मात्रा के साथ गुरु की कोई बाध्यता नहीं

17 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 10/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
  2. Dr Swati Gupta 10/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
  3. Meena bhardwaj 10/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
  4. kiran kapur gulati 10/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
  5. C.m sharma(babbu) 10/09/2016
  6. C.m sharma(babbu) 10/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
  7. निवातियाँ डी. के. 10/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
  8. mani 10/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
  9. Kajalsoni 13/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 13/09/2016

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