मेरी बदनसीबी – मेरा होंसला (विवेक बिजनोरी)

आज होंसलो से ही तो पहचान बन गयी,
थी बदनसीबी मेरी आफत-ए-जान बन गयी..
एक कदम आगे बढ़ाया जो फकत,
रूबरू हुए शोहरत शान बन गयी..

थी बदनसीबी मेरी आफत-ए-जान बन गयी..

सबको था मैं नाकाम सा दिखता रहा,
बस हर रोज कागज पे हर्फ लिखता रहा..
आज वो हर्फ़े ही मेरा सम्मान बन गयी..

थी बदनसीबी मेरी आफत-ए-जान बन गयी..

शिद्दत ही थी जो बदल गयी मेरा जहाँ,
शायद इसके काबिल था मैं वरना कहाँ..
शिद्दत से तो पत्थर की मूरत भी भगवान् बन गयी..

थी बदनसीबी मेरी आफत-ए-जान बन गयी..
आज होंसलो से ही तो पहचान बन गयी

विवेक कुमार शर्मा

8 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 09/09/2016
    • Vivek Sharma 10/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/09/2016
    • Vivek Sharma 10/09/2016
  3. Shishir "Madhukar" 10/09/2016
    • Vivek Sharma 10/09/2016
  4. C.m sharma(babbu) 10/09/2016
    • vivekinfotrend 21/09/2016

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