बाबुल का अंगना – (विवेक बिजनोरी)

बचपन बीता आयी जवानी,
डोली है अब मेरी जानी..
छूट जाये बाबुल का अंगना,
रीत है कैसी आज निभानी..
कल तक इस घर में थी चहेती,
कल जिंदगानी दूजे घर बितानी..
छूट जाये बाबुल का अंगना,
रीत है कैसी आज निभानी..
प्यार कहाँ मिल पायेगा ऐसा,
कौन सुनाये परियो की कहानी..
जा तो रही हूँ बाबुल मैं पर,
भूल न पाऊँ वो बातें पुरानी…
छूट जाये बाबुल का अंगना,
रीत है कैसी आज निभानी..

विवेक कुमार शर्मा

7 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 08/09/2016
    • vivekinfotrend 21/09/2016
    • vivekinfotrend 21/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 09/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 09/09/2016
    • vivekinfotrend 21/09/2016

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