कचरा पेटी 1……सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

तुम तब कितना अपने से थे….
कचरा ही सही सब निकालते थे…
और मैं…
उसको अपने अंदर..
कुछ इस तरह ढक लेती थी कि…
उसकी गंध किसी तक भी…
ख़ास कर तुम तक ना पहुंचे…
फ़िक्र थी तुम्हारी घुटन की…
बेशक मेरी सांसें उस गंध से घुट रहीं थी….
पर तुम्हारी साँसों को महसूस करने को…
अपनी साँसों का घुटना मंज़ूर था मुझे….
पर तुम…..
बिना बोले…
बिना मेरी घुटन को महसूस किये…
चले गए….
बदल दिया मुझको….
\
/सी. एम्. शर्मा (बब्बू)

8 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/09/2016
    • babucm 07/09/2016
  2. Kajalsoni 06/09/2016
    • babucm 07/09/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 06/09/2016
    • babucm 07/09/2016
    • babucm 07/09/2016

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