मैं प्यासी हुं ” नदी “

एक दशक से बेठी मौन
जलधारा के प्रवाह से
नदी उफनती
मेघ मल्लाहरो़ से बतियाती
किनारों से कहती है
मैं प्यासी हूँ
किनारे नहीं सुनते मेरी…
हमेशा की तरह
पर सुनो आज उनकी
आवाज
अस्थिर वेगवान पानी
को थामने का
असफल प्रयास करने वाले
स्थिर पत्थरों के शोर में
दबे है पूरे लाचार
नदी पूरी एक दशक से प्यासी है।
वह अपने उद्गम से ही
पुकारती
मुँह फाड़े हुकारती है
प्रस्फुटित धारा की लय में
गुम होती दहाड़ती है
नदी की पुकार ही
नदी की गुहार लगाती
ऊँचे पहाड़ों को
जिनके बीच उसकी फुफ्कार
भू तल की गहराई को नापती है
आज भी प्रतिध्वनित हो रही है
नदी सदियों से प्यासी है।
कल कल करती
सिंहनाद करती
वरदान नदी
हिलोरे मचाती है
अथाह जल देख
फिर चिल्लाती
अशांत किनारों से
टकराकर शोर मचाती
समन्दर से मिलने को
उतावली हो जाती है
दौड़ी-दौड़ी
सबकी की प्यास बुझाती
सागर में समाहित हो जाती है

कपिल जैन

2 Comments

  1. C.m sharma(babbu) 04/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/09/2016

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