अधूरी प्रेम-कहानी

जिस रास्ते वो हमेशा गुजरा करती, मैं रोज वही खड़ा उसे निहारा करता था,
देखेगी पलटकर एक ना एक दिन, यही सोचा करता था,
कब मिल जाये मौका भूले से ही सही, गुलाब सीने में छुपाये रखा करता था,
कभी जुदाई का गम तो कभी बेवफाई का रंग, एक खंजर भी दामन में छुपाये रखा करता था,
जिस रास्ते वो हमेशा गुजरा करती, दिल टुटा अपना थामा करता था ,
कभी कभी गुलाब हांथो से छूट, खंजर की नोक पे गिरा करता था,
जिस रास्ते वो हमेशा गुजरा करती, इन्तजार नजरो का किया करता था,
मिलेगी एक न एक दिन नजरे उससे, आँख ही आँखों में इजहार किया करता था,
हद हो चुकी थी चुप्पी की, उसकी बातों को तडपा करता था,
आज फैसला हो जायेगा, हरदम यही सोचा करता था…..
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To Be Continue
शीतलेश थुल

16 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 03/09/2016
    • शीतलेश थुल 04/09/2016
  2. Shishir "Madhukar" 03/09/2016
    • शीतलेश थुल 04/09/2016
    • शीतलेश थुल 04/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/09/2016
    • शीतलेश थुल 04/09/2016
  4. mani 03/09/2016
    • शीतलेश थुल 04/09/2016
    • शीतलेश थुल 04/09/2016
  5. Cm sharma (babbu) 04/09/2016
    • शीतलेश थुल 04/09/2016
  6. Kajalsoni 04/09/2016
    • शीतलेश थुल 07/09/2016

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