बुढ़ापा

बुढ़ापा।

आंखे द्रवित मन निर्झर
देह बनी अस्थि पिंजर ।
रंग हुआ सस्य- श्यामल
काल ने डस लिया हर अंग
चांदी बना हर स्याह बाल
सब कुछ बदल जाता है मानव
क्या रहता है जीवन भर।
आंखे द्रवित मन निर्झर
देह बनी अस्थि पिंजर ।
अधरों की लटकी है खाल
है जरूरत सहारे की
टेढी-मेढी हुई है चाल
कमर लगी है बल खाने
हड्डियां लगी हैं करने चर्मर।
आंखे द्रवित मन निर्झर
देह बनी अस्थि पिंजर ।
दूसरों की सेवा तुने
माना कभी की ही नही
आज अपना प्रायश्चित कर
भुला क्यों तु उसको प्राणी
जो तेरा रखवाला है ईश्वर।
आंखे द्रवित मन निर्झर
देह बनी अस्थि पिंजर ।
-ः0ः-

2 Comments

  1. कुशवाह विकास ( दिनेश ) 02/09/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 03/09/2016

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