बेरहम – शिशिर मधुकर

बेरहम हो के जो उसने किसी को भुला दिया
चोट ऐसी करी दिल पर पत्थर भी रुला दिया

बड़ी मेहनत से सँवारा था खण्डर हुआ महल
एक जलजले ने फ़िर सब मिट्टी में मिला दिया

बागो में अब इठला के घूमा करती है दुनियाँ
माली मगर खुश है उसने गुलशन खिला दिया

अगर वो जान भी दे दें उसे कोई भी पूछता नहीं
मुकद्दर ने उसको हरदम कुछ ऐसा सिला दिया

अपनी फितरत कैसे कोई बदले यहाँ मधुकर
वो उसी का हो गया जिसने सागर पिला दिया

शिशिर मधुकर

12 Comments

  1. Manjusha 01/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 03/09/2016
  2. Kiran Kapur Gulatit 02/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 03/09/2016
  3. babucm 02/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 03/09/2016
  4. शीतलेश थुल 02/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 03/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 03/09/2016
  5. mani 02/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 03/09/2016

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