बंटवारा

बाबू जी एक रोटी को हमेशा
भाईयों में बाँटते थे एक जैसा
रोटी एक थी उसके हिस्से हम
रोटी एक थी पर खुश थे हम

खून का रिश्ता वो हमारा
रोटी का रिश्ता बना न्यारा
उम्र के साथ रोटियाँ बढती गई
बंटवारे का हिस्सा परवान चढ़ती गई
फिर सिर्फ हिस्से का हिसाब रह गया
न जाने वो एक रोटी कहाँ खो गई
माया का जादू ऐसा चल गया
भूख मर गई, लालच पल गया

एक रोटी बंट कर भी परिवार बनाती है
एक कोशिका बंट कर ही शरीर बनाती है
एक देश, एक मानवता,बनती है पृथ्वी एक
बंट पाये त्रिदेव भी जब,बनती है सृष्टि एक
बंटना और बंट कर बनना ही है निरंतर ब्रम्ह
बनते प्रेम बाँध से, बाँटते लालच, ईर्ष्या, दंभ

10 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 01/09/2016
    • Uttam 04/09/2016
  2. babucm 01/09/2016
    • Uttam 01/09/2016
  3. Shishir "Madhukar" 01/09/2016
    • Uttam 01/09/2016
  4. ALKA 01/09/2016
  5. mani 01/09/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016

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