सूर्य बन कर

प्राणों में तेज जगाती तुम सूर्य बन कर
दिलों में प्यास बढ़ाती तुम सूर्य बन कर

धरती को उर्वर बनाता है प्रेम का बीज
जीवन के कोख में आती तुम सूर्य बन कर

अपनी ही परछाईयों की सूरत क्यों डराती है हमें
परछाईयों को बनाती और मिटाती तुम सूर्य बन कर

गर्द के घाव रोग संक्रामक उगलते हैं सदा
हवन की आग से नहाती तुम सूर्य बन कर

आग हो ऐसी कि हर पत्थर कराह उठे
सागर को भी बादल बनाती तुम सूर्य बन कर

तप तप कर के ईश्वर बने बुद्ध और महावीर
इस कदर आत्मा को तपाती तुम सूर्य बन कर

नहीं डूबता अहसास तेरा दर्द के समंदर में भी
चाँद के आईने में मुंह दिखाती तुम सूर्य बन कर

आनंद के क्षितिज में आस्था का पूर्व बन कर
अमर प्रकाश दिलों में लाती तुम सूर्य बन कर

9 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 01/09/2016
    • Uttam 01/09/2016
  2. vinay kumar 01/09/2016
  3. babucm 01/09/2016
    • Uttam 01/09/2016
  4. Shishir "Madhukar" 01/09/2016
    • Uttam 01/09/2016
  5. kiran kapur gulati 02/09/2016

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