नारी (मत्त सवैया या राधेश्यामी छंद)

नारी तुम! सुकुमार कुमुदुनी
सौम्य स्नेह औ प्रेम प्रदाता
धरती पर हो शक्ति स्वरूपा
तुम रण चंडी भाग्य विधाता।।

संस्कारों की शाला तुम हो
तुम लक्ष्मी सावित्री सीता
सत्कर्म की निर्वाहिनी तुम
हे! सहधर्मिणी हे! अर्पिता।।

सह कर असह्य प्रसव वेदना
तुम लाल धरा पर लाती हो
तुम हो धात्री अखिल जगत की
तुम्ही सृष्टि सृजन बढाती हो।।

हे रूपवती हे कमनीया
ईश्वर की तुम अद्भुत रचना
तलवार धरो जब कर में तो
मुश्किल है अरिदल का बचना।।

करुणा का हो सागर अथाह
तुम सकल प्रेम की परिभाषा
तुम जीवन सँगिनी हो नर की
तुम शिशु ममत्व की अभिलाषा।।

तुम हो माता भगिनी भार्या
ईश्वर का हो वरदान तुम्ही
घर आगन को रोशन करती
हो शुचिता की पहचान तुम्ही।।
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सुरेन्द्र नाथ सिंह ‘कुशक्षत्रप’

(मत्त सवैया छंद एक मात्रिक छंद है यह छंद चार पंक्तियों में लिखा जाता है और प्रत्येक पंक्ति में ३२ मात्राएँ होती हैं तथा १६, १६ मात्राओं पर यति व अंत गुरु से होता है | तुकांतता दो-दो पंक्तियों या चारों पंक्तियों में निभाई जाती है)

20 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  2. Kiran Kapur Gulatit 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  3. babucm 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  4. Shishir "Madhukar" 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  5. Dr Swati Gupta 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  6. Bindeshwar prasad sharma 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  7. निवातियाँ डी. के. 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  8. mani 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
  9. Rinki Raut 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/09/2016
  10. ALKA 01/09/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/09/2016
  11. anup 16/03/2019

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