अंधकार -प्रियंका ‘अलका’

रात चाँद ने आँखें भींच
बादल का है ओट लिया,
नहीं चांदनी
नहीं हैं तारे
आसमान ने अंधकार को
ओढ़ लिया ।

अंधकार में छिपकर
धरा की लाज
धरा में मिल गई,
किसी की बेटी
किसी की बहना
हाय देखो!
आज लुट गई।।

किसने लूटी
कितनों ने लूटी
कहाँ है लूटी
और कैसे लूटी
सारी बातें
अखबारों में छप गई
पर हुआ क्या…..

राजनीति का पत्ता खुल गया
सबने अपना-अपना
दांव चल दिया ।

हाथों में मोमबत्तियाँ जल गई
न्याय -न्याय चिल्लाती जनता
दो दिन तक
सड़कों पर बैठी।।
फिर…
फिर क्या,

मामला अब ठंडा पड़ गया
कोई और हादसा
अब सुर्खियों पर चढ़ गया ।

अब समय कहाँ
जो बीती बातों को याद करे
फरियाद सुने
फरियाद सुने
न्याय करे
हाँ न्याय करे।।

जिसने अपना सबकुछ खोकर
न्याय का रस्ता देखा
मरी हुई आत्मा को
जगा-जगा कर रखा,
आज कोई नहीं है
पूछने वाला ,
आज कोई नहीं है
सुनने वाला ,
पीड़ा से तड़पती रूह का
अब पोर -पोर
पड़ा है मैला।

अलका

14 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 31/08/2016
    • ALKA 01/09/2016
  2. MANOJ KUMAR 01/09/2016
    • ALKA 01/09/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
    • ALKA 01/09/2016
  4. babucm 01/09/2016
    • ALKA 01/09/2016
  5. Shishir "Madhukar" 01/09/2016
    • ALKA 01/09/2016
    • ALKA 01/09/2016
  6. mani 01/09/2016
    • ALKA 01/09/2016

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