काली रात – शिशिर मधुकर

मैं तुमको ना भुला सका आखिर तो कोई बात है
ये कोई शिकवा नही मेरे दिल के बस जज्बात हैं

सूरज निकलेगा सुबह हर दिल की ये आवाज़ है
पर जल्दी नही ढलती गमों की जो काली रात है

मैं तन्हां चाहे रहा पर किसी से कुछ भी ना कहा
मुद्दतो बाद भी तुझसे मेरी ताजा वो मुलाकात है

कोई जोड़े कोई तोड़े कोई तूफां का रुख मोड़े है
इंसानो की इस बस्ती में कितनी अनोखी जात है

जड़े होती हैं गहरी जिन पेड़ों की बाग़ में मधुकर
बड़ी हिम्मत से सह जाते वो सारे बुरे आघात हैं.

शिशिर मधुकर

14 Comments

  1. mani 31/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 31/08/2016
  2. babucm 31/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 31/08/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 31/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 31/08/2016
  4. Bindeshwar prasad sharma (bindu) 31/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 31/08/2016
  5. Shishir "Madhukar" 31/08/2016
  6. MANOJ KUMAR 01/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 01/09/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/09/2016
    • Shishir "Madhukar" 01/09/2016

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