“माँ”

SheetMaa
आँखे जो कभी ढूँढा करती थी मुझे,
आज अपनी ही आँखे (चश्मा)
ढूँढा करती है “माँ”,
सहारा जो कभी बना करती थी मेरा,
सहारा ढूँढा करती है “माँ”,
पीटा करती थी अक्सर जिससे मुझे,
सबक सिखाया था जिससे मुझे,
उसे टेक चलती है “माँ”,
भोर कालीन आँख खुले तो,
थकी हुई सी लगती है “माँ”,
पकड़ा करती थी हरदम मुझको,
आज हार जाती है “माँ”,
भाग दौड़ के इस सफ़र में,
पीछे रह जाती है “माँ”,
खाने में निकला कंकर जब दांतों से टकराता है,
याद दिलाता है मुझे, अब बूढी हो गयी है “माँ”
शीतेलश थुल !!

14 Comments

  1. babucm 29/08/2016
  2. शीतलेश थुल 29/08/2016
  3. शीतलेश थुल 29/08/2016
  4. mani 29/08/2016
  5. शीतलेश थुल 29/08/2016
    • शीतलेश थुल 29/08/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 29/08/2016
    • शीतलेश थुल 29/08/2016
  7. Shishir "Madhukar" 29/08/2016
    • शीतलेश थुल 29/08/2016
  8. Kajalsoni 29/08/2016
    • शीतलेश थुल 29/08/2016

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