कीमत दो चुटकी सिन्दूर की

कल मै हसती खेलती आँगन में
आज शर्मों लिहाज़ से ढकी हूँ

कल थी मै माँ की लाडली
आज सासू माँ की बहु हूँ……..

कल मै चिड़ियाँ उड़ते गगन की
आज रसोई की सजावट हूँ

कल जो थी मै घर-घर खेली
आज उसी घर की बनावट हूँ….

कल थी मै पापा की परी
आज ससुर जी की आन हूँ

जो घर में रहकर सुरक्षित रहे
उनके लिए वही सम्मान हूँ….

इस दो चुटकी सिन्दूर ने मुझमे
आत्मविश्वाश ऐसा भरा

पाया मैंने पति का साथ
और ससुराल को मैंने अपना बना ही लिया…

पर इन दो चुटकी सिन्दूर की कीमत
अब मै अच्छे से समझ गयी

छूटा माँ बाप का साथ
और सहेलियों के संग हसी ठिठोली भी छुट गयी….

अब मेरे हर कदम पर मेरे पति का साथ है
दो चुटकी सिन्दूर लगाकर भूल जाओ मायका
यही समाज का इन्साफ है……

14 Comments

  1. शीतलेश थुल 29/08/2016
    • shrija kumari 29/08/2016
  2. babucm 29/08/2016
    • shrija kumari 29/08/2016
  3. mani 29/08/2016
    • shrija kumari 29/08/2016
  4. Shishir "Madhukar" 29/08/2016
    • shrija kumari 29/08/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 29/08/2016
    • shrija kumari 29/08/2016
    • shrija kumari 29/08/2016
  6. Kajalsoni 29/08/2016
    • shrija kumari 30/08/2016

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