ज़मीनी हकीकत

दिन रोज़ ढलता है, शाम गुजरती हैं,
मुसीबतें पार कर ही शख्सियत उभरती हैं।

रुह तक कॅाप जाती है इबादत करने में
कई कोशिशों बाद कोई तामीर सवरती हैं।

हर किस्से के अक्सर कई पहलू होते हैं,
चराग के साथ साथ कुछ हवा भी जलती है।

रुकना नहीं कभी, आगे ही बढते रहना है,
यही बात रोज़ मेरे कानों से गुजरती है।

12 Comments

  1. Rinki Raut 21/08/2016
    • दीपेश जोशी 22/08/2016
  2. Shishir "Madhukar" 22/08/2016
    • दीपेश जोशी 22/08/2016
  3. babucm 22/08/2016
    • दीपेश जोशी 22/08/2016
  4. mani 22/08/2016
    • दीपेश जोशी 22/08/2016
    • दीपेश जोशी 22/08/2016
    • दीपेश जोशी 24/08/2016

Leave a Reply