किस्सा उनकी मोहब्बत का

बैठा हूँ यारों की महफ़िल में
है मोहब्बत का किस्सा सुनाना
पर पी ली है इतनी यारों
की अब होश नहीं है

सहेलियों से थी वो बातें कर रही
और मेरी नज़रें उनपर जा टिकी
मैंने समझाया न कूदो इस सागर में
पर मेरी रूह मुझसे ही बदमाशियां कर गयी

मिला जब पहली बार
नज़रें थी उनकी झुकी
और क्या बताऊँ यारों
उसके बाल उसके आँखों से
थी अटखेलियाँ कर रही

अनजाने ही सही पर
उनकी नज़रें भी हमसे टकराई
मन में तो थी बड़ी घबराहट
पर चेहरे पे मुस्कान आई

नजरों नजरों में ही हम उन्हें दिल दे बैठे
कभि सोचा न था जिस मयखाने में जाने की
आज उसी ओर फिसल गए

की आँखें बंद मैंने ली लम्बी सांस
सोचा कह डालूं उनसे अपने दिल के जज्बात
आँखे खोली मैंने न जाने कहाँ वो गुम हो गयी
इज़हार तो बहुत दूर है यारों चन्द बातें भी न हुई

न जाने ये कैसी चाहत है
या फिर मोहब्बत का उसूल यही है
मयकशी इतनी है यारों
की अब होश नहीं है……..

14 Comments

  1. mani 21/08/2016
    • shrija kumari 21/08/2016
  2. C.m sharma(babbu) 21/08/2016
    • shrija kumari 21/08/2016
  3. shrija kumari 21/08/2016
  4. sarvajit singh 22/08/2016
    • shrija kumari 22/08/2016
  5. शीतलेश थुल 22/08/2016
    • shrija kumari 24/08/2016
    • shrija kumari 24/08/2016
  6. Rinki Raut 25/08/2016
  7. shrija kumari 26/08/2016

Leave a Reply