सिन्दूर

चले जाते हो तुम छोड़कर
जैसे कोई नाता नहीं
नहीं देखते एक बार मुड़कर
जैसे घर भाता नहीं

यूँ कर देते हो तन्हा
तुम अपनी जोगन को
जैसे अधजली मरघट की बेल
तड़प रही हो यौवन को

तेरी यादों का तकिया बनाकर
बच्चों संग सो जाऊंगी
तुम चढ़ाना गर्दन भारती को
मैं दिल अपना चढ़ाऊँगी

प्रियतम तुम विचलित न होना
मैं यूँ ही सहती जाऊंगी
खून उठाकर मातृभूमि से तेरा
सिन्दूर अपना बनाऊंगी

4 Comments

  1. mani 21/08/2016
  2. C.m sharma(babbu) 21/08/2016
  3. Shishir "Madhukar" 21/08/2016

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