ऐ चाँद–२……………मनिंदर सिंह “मनी”

सुन मेरी बातें,
चाँद लगा मुस्कुराने,
हुआ प्रतीत ऐसा,
जैसे लगा हो अपने गम छुपाने,
उसमे पड़े काले धब्बे,
गहरे और गहरे होते गए,
रो पड़ा हो तोड़,
जैसे कोई बांध,
मेरी बातों के बहाने,
आहिस्ता, आहिस्ता,
नमी से भरी आवाज़ में,
लगा अपनी बात सुंनाने,
है इश्क मुझे रवि से,
पर वो मेरी किस्मत में नहीं,
वो तुम्हे जगाने में,
मैं तुम्हे सुलाने में,
बस दोनों गुजर रहे है,
अपना-अपना फ़र्ज़ निभाने में,
शायद करीब जाकर,
दिख जाये उसकी मुझे,
नादानियां, या उसे मेरी,
दूर दूर रहकर,
अपना ही मज़ा है मुस्कुराने में,
मिलन होता, चंद्र ग्रहण और,
सूर्य ग्रहण पर,
अलग सा है आनंद,
मुद्दतो बाद ही सही करीब आने में,
रहता हु मैं तारो के बीच,
पर अकेला तन्हा तन्हा सा,
वो हँसते है देख मेरी,
दीवानगी,
कहते क्या फ़ायदा ऐसे याराने में,
इश्क ना देखे जात,
ना देखे नफा-नुक्सान,
ये सौदे है दिल के,
होते नहीं ज़माने में,
अपने इश्क से,
अपने कर्म से,
कही भटक ना जाऊ,
कही टूट ना जाऊ,
तो क्या बुराई है, तन्हा हो जाने में,
ऐ “मनी” मैं बेवफा नहीं,
लुटा अपने प्यार को,
लगा हु शिद्दत से अपना फ़र्ज़ निभाने में,

18 Comments

  1. babucm 20/08/2016
    • mani 20/08/2016
  2. शीतलेश थुल 20/08/2016
    • mani 20/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/08/2016
    • mani 20/08/2016
  4. Shishir "Madhukar" 20/08/2016
    • mani 20/08/2016
    • mani 20/08/2016
  5. Dr Swati Gupta 21/08/2016
  6. mani 21/08/2016
  7. Er Anand Sagar Pandey 21/08/2016
  8. mani 21/08/2016
    • mani 21/08/2016
  9. sarvajit singh 21/08/2016
    • mani 21/08/2016

Leave a Reply