लोकेन्द्र की कलम से

इंसा हे तू दरिंदा न बन
ज़मी पर रख पैर अपने परिंदा न बन ..
यूँ तो दुनिया बनी हे तुझसे
पर तू अपनी दुनिया अलग चाहता हें
कम पड़ रही हे ज़मी अब तू फलक चाहता हे
पत्थर के शहर में ज़ज़्बात कहा मिलते हे
मिलते हे दो शख्स ख्यालात कहा मिलते हे
दौलत, शोहरत माना काम की बाते हे
मोहब्बत, ईमान भी तो कम ही आते हे
हर मज़हब,हर इंसा तेरे ही गुलशन का फूल हे
तू चुनिन्दा न बन
ज़मी पर रख पैर अपने परिंदा न बन…………
लोकेन्द्र

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/08/2016
  2. mani 20/08/2016
  3. C.m sharma(babbu) 20/08/2016

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