कुण्डलिया छंद

खिड़की को देखूं कभी, कभी घड़ी की ओर,
नींद हमें आती नही ,कब होगी अब भोर।
कब होगी अब भोर, खेलने हमको जाना,
मारें चौककेँ छक्के ,हवा में गेंद उड़ाना।
कह अम्बर कविराय, पड़ोसन हम पर भड़की,
जोर जोर चिल्लाये , देख कर टूटी खिड़की।
©अभिषेक कुमार अम्बर

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 20/08/2016
  2. babucm 20/08/2016
  3. mani 20/08/2016
  4. Abhishek Kumar Amber 22/08/2016

Leave a Reply