गौर भी है

ये तो फकत आगाज है अंजाम और भी है
इस दौर की सियासत के रंग और भी है

इल्जाम अब हम पर है तो हम ही सही
वैसे कातिल तो जमाने में और भी है

हमारा होना ही खलता बहुत है जमाने को
बस यही दुःख है जमाने में,या और भी है

चलो माना हम खुदगर्ज है तेरी नजरों में
पर शान्त,उदास लहजे के तौर और भी है

कुछ और लोग भी है खफा हमसे शहर मे
पर गौरतलब तो ये है हम पर गौर भी है

2 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/08/2016
  2. babucm 20/08/2016

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