मुकद्दर – शिशिर मधुकर

बड़ी मुश्किल से हमें जीने का सहारा मिला था
तूफां में घिरी कश्ती को एक किनारा मिला था

वैसे तो जिन्दगी यहाँ मुद्दतों से आबाद नहीँ थी
अपनों ने ही चालाकी से मुहब्बत को छला था

सहरा की तपन में हम छाँव पानी को तरसे थे
मगर हमको कोई भी चश्मा साया ना मिला था

हिम्मतो की दास्तानें सुन हमने क़दम बढाए थे
फिर जो भी हुआ साथ वो उसका ही सिला था

किस्मत से कभी ना कोई जीत पाया हैं मधुकर
मुकद्दर में जो था वो ही तो हमको भी मिला था.

शिशिर मधुकर

12 Comments

  1. mani 19/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 20/08/2016
  2. sarvajit singh 20/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 20/08/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 20/08/2016
  4. babucm 20/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 20/08/2016
  5. शीतलेश थुल 20/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 20/08/2016
    • Shishir "Madhukar" 20/08/2016

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