खैर छोड़ो कुछ नहीं

जिंदगी रूठे तो रूठ जाये कुछ नहीं
छूटे साँसे तो छूट जाये कुछ नहीं

चाहे तो बस इतना अता कर दे मौला
इक ताल्लुक गहरा बन जाये कुछ नही

बहुत कुछ कहना है इक जरा बात सुनों
खैर छोड़ो क्या कहा जाये कुछ नहीं

सम्भालें इन कदमों को या बहकने दें
खुद को अपनालें या वना ले कुछ नहीं

इक रिवाज मौत तक मेरे साथ चले
मै जीतता रहूँ पर हाथ आये कुछ नहीं

2 Comments

  1. mani 19/08/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/08/2016

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