क्यों आसक्ति हुयी अन्जाने से

वर्ण पिरामिड

था
खड़ा
बस में
भीड़ बीच
हो असहाय
यूँही बेखबर
आने वाले पल से
आई कही से खुसबू
मदहोश करने वाली
दिल बेचैन सा होता गया

थी
बैठी
सुकन्या
अप्सरा सी
देख उसको
हुवा अवाक सा
भूल गया खुद को
बस उसे देखता रहा
मै बेबस सा, बेचैन सा
अपना अस्तित्व खोता गया

है
हम
अब भी
अनभिज्ञ
एक दूजे से
पर लगे ऐसे
है चिरपरिचित
उठता प्रश्न मन में
तूफान क्यों उठा तन में
क्यों आसक्ति हुई अन्जाने से
!!!!
!!!!
सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

12 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 16/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/08/2016
  2. babucm 16/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/08/2016
  3. Kajalsoni 16/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/08/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 16/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/08/2016
  5. Dr Swati Gupta 16/08/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/08/2016

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